पेरियार – दक्षिण भारत की शर्मनाक कहानी

पेरियार – दक्षिण भारत का शर्म।
पेरियार ने कांग्रेस से अलग हटकर 1926 में आत्म सम्मान आंदोलन की शुरूआत की थी। आत्मसम्मान आंदोलन का प्रारंभ जाति व्यवस्था की समाप्ति, व नई वैवाहिक व सामाजिक व्यवस्था की रचना पर आधारित थी। धार्मिक प्रतीकों, विश्वासों व उपासनाओं का ‘पेरियार’ने खुलकर विरोध किया। और अपने समर्थकों को कहा कि ‘विवेकवाद’से बड़ा धर्म विश्व में अन्य कोई धर्म नहीं है। परन्तु इस आंदोलन में एक नई सामाजिक द्वेष को सामने लाया। विभिन्न जगहों पर ‘धार्मिक पुरोहितों’के साथ मारपीट की गई, ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरुद्ध अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया गया, मनुस्मृति को सार्वजनिक जगह पर आग लगा दी गई, रामायण’को हिन्दू आर्यन सभ्यता का पाखंड कहा गया और इस धार्मिक पुस्तक को द्रविड़ सभ्यता व संस्कृति को हीन करने का दोषी माना गया। धार्मिक स्थलों व मंदिरों में विशाल जनप्रदर्शन के नाम पर देवी-देवताओं को मूर्ति व धार्मिक लोगों को जूते से पीटा गया। हिन्दू सभ्यता व उनके विश्वासों व प्रतीकों उच्च जाति का पाखंड बताया गया। पेरियार की ब्राह्मणवादी व्यवस्था का विरोध इस हद तक पहुँच चुका था कि वह अपनी भाषा की मर्यादा भी भूल चुका था। अपनी पत्रिका ‘कुदी अर्सु’के माध्यम से वह कई बार ऐसी बात कह जाता था जिसे सभ्य समाज शायद ही स्वीकार कर सके। वह ब्राह्मण महिलाओं पर व्यक्तिगत टिप्पणी करने लगा और उन्हें सार्वजनिक रूप से कई बार अनैतिक भी कहा, ब्राह्मणों को हत्या के लिए गैर-ब्राह्मणों को प्रोत्साहित करना, भगवान राम की मूर्ति को सार्वजनिक रूप से जलाना, संस्कृत भाषा को एक मृत भाषा के रूप में मजाक उड़ाना, तमिल भाषा की श्रेष्ठता हिंदी व संस्कृत का उपहास ऐसे कई पेरियार के विचार थे, जो सभ्य संस्कृति के विरुद्ध थी और पेरियार के विरोधाभासी व्यक्तित्व का परिचायक था (विकीपीडिया/पेरियार)।
यद्यपि पेरियार स्वयं कहा था कि “ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरोध का अर्थ ब्राह्मण जाति का या उसके संरक्षक बनिया जाति का विरोध  करना नहीं है, अपितु, उस सोच या व्यवस्था कि विरोध  है जो इसके समर्थक है।” परन्तु पेरियार की भाषा व लेखनी इस विचार के विरुद्ध दिखती थी। वह व्यक्तिगत रूप से ब्राह्मण जाति के विरुद्ध टिप्पणी करता था, आर्यन जाति के लोग जो वर्तमान भारत में 72 प्रतिशत व उसके विरुद्ध टिप्पणी करता था, करोड़ों हिन्दू धर्मावलम्बियों की भावनाओं को उनके देवी-देवताओं के प्रति अश्लील प्रसंग को उद्धृत कर व उन्हें सार्वजनिक रूप से पददलित कर अपनी राजनीतिक कुंठा का शांत करता था। 1937 के मद्रास प्रांत की सरकार ने जब हिंदी भाषा को ‘अनिवार्य विषय’ के रूप में स्कूली शिक्षा में शामिल किया, तो पेरियार का ब्राह्मण विरोध उत्तर भारत के विरोध में परिवर्तित हो गया। ब्राह्मण व गैर-ब्राह्मण की लड़ाई, उत्तर और दक्षिण की लड़ाई में तब्दील हो गई। आर्यन सभ्यता व द्रविड़ सभ्यता के बीच संघर्ष का मुद्दा हो गया। तमिल भाषा की श्रेष्ठता व हिंदी भाषा के साम्राज्यवाद में परिवर्तित हो गया। इस संकीर्ण सोच का आधार इतना अधिक बढ़ा कि जिस जस्टिस पार्टी की सदस्यता पेरियार खारिज कर चुके थे, उसकी अध्यक्षता 1939 में स्वीकार की और 1944 आते-आते इस पार्टी का विभाजन कर एक नए दल का ‘द्रविड़ कड़गम’(द्रविड़ों का संगठन) की स्थापना की। जिसका मुख्य लक्ष्य एक गैर-ब्राह्मण ‘द्रविड़स्तान’राष्ट्र को स्थापित करना था (एन. ड्रिक्स, पृ. 282-83)।
संकीर्णता व क्षेत्रवाद की राजनीति का स्वरूप प्रारंभ में एक छोटे से विरोध पर ही आधारित क्यों न हो, अंतः में उसका स्वरूप विध्वसंक ही हो जाता है। पेरियार ने जिस ‘तमिल राष्ट्र’ का बीज 1940 के दशक में रखा था, वह तमिल राष्ट्र’ स्वतंत्रता परान्त तेलगू स्मिता’, कन्नड़ स्मिता व मलयाली अस्मिता में बदल गई। जिस हिंदी भाषा का विरोध के नाम पर वह राष्ट्रविरोधी व आर्य सभ्यता विरोधी हो गये, उसी भाषा व क्षेत्र की श्रेष्ठता के आधार पर मद्रास प्रांत बँटकर चार नये प्रांत में तब्दील हो गया। जिस महिला सशक्तीकरण के नाम पर वह ब्राह्मणवादी व्यवस्था का विरोध कर रहे थे, स्वयं उसके भंजक बन गये। जब 70 की आयु में एक 30 वर्षीय महिला से विवाह किया तो उनके सबसे करीबी सहयोगी सी. एन. अन्ना दुरई ने ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’एक नये दल की स्थापना कर ली और ‘तमिल राष्ट्र’के मिशन के बीच में ही हवा निकाल दी। जिस ‘विवेकवाद’ व धार्मिकता’ की वकालत कर रहे थे, वह उसका स्वरूप इस्लाम, ईसाई व बुद्धिज्म धर्म की प्रशंसा व हिन्दू धर्म के विरोध में बदल गया। तिरुचरापल्ली के रेलवे संगठन के कर्मचारियों को संबोधित करते हुए मुस्लिम धर्म व उसके विश्वास को उसने खुलकर प्रशंसा की। उनके शब्दों में मुसलमान उसी पुराने दर्शन में विश्वास करते हैं, जिसे द्रविड़यन अपना मानते हैं। अरबिक शब्दावली में द्रविड़यन धर्म का अर्थ इस्लाम होता है। उसने खुलकर अपने अनुयायियों को प्रोत्साहित किया कि वह इस्लाम, ईसाई व बुद्धिज्म धर्म अपनाये (विकीपीडिया.ओआरजी/पेरियार)।
द्रविड़ कड़गम की स्थापना के  समय पेरियार  तमिल राष्ट्र की स्थापना की वकालत कर रहे थे और उसका  विस्तार श्रीलंका के भू-क्षेत्र तक करना चाहते थे ।  जिसका आधार वो ब्राह्मण विरोध की राजनीति को बनाया था और  उसे ही आधार बनाकर नयी पार्टी का गठन किया था  । तमिल पेरियार को तमिलियन नहीं मानते थे। उनका मानना था कि ये कन्नड़ है, यद्यपि पेरियार स्वयं को तमिल कहलाना ज्यादा पसंद करते थे। अतः स्थापना के समय उन्होंने तीन प्रमुख व्यक्ति जो उस दल का नेतृत्व करेंगे उस योजना के तहत उन्होंने तात्कालिक मद्रास प्रांत के तीन महत्वपूर्ण भाषायी आधार पर विभाजित क्षेत्रों के लोगों को नेतृत्व प्रदान कर एक तमिल राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह रही कि उनके जीवन काल में ही तीनों भाषायी क्षेत्र के लोगों ने अपने-अपने भाषीय आधार पर नये राज्य की मांग कर दी।
कन्नपर जो तेलगू जाति के थे जो वर्तमान का आंध्रप्रदेश है उस भाग से आते थे। सी. एन. अन्नादुरई जिसने 1945 में पेरियार का साथ छोड़ नई पार्टी बना लिया था तमिल थे, और पेरियार स्वयं कन्नड़। भारत की आजादी ने राष्ट्रविरोधी विचार जहाँ मद्रास के तीन प्रांतों से बिल्कुल ही समाप्त कर दिया, वही तमिलनाडु में 1950 और 1960 के दशक में भारत विरोधी आंदोलन का स्वर यदा-कदा सुनाई पड़ता है। जिसका श्रेय ‘पेरियार’ को जाता है।
जिस जातीय व्यवस्था का वह विरोध करते थे, वह स्वयं किस जाति के हैं उसे अपने बैठकों में लोगों को बताते थे, वह कहते थे कि लोग मुझे तेलगू नायडू जाति का समझते हैं लेकिन मैं कन्नड़ बलीजा नायडू जाति का हूँ। कहने का तात्पर्य यह हुआ कि जिस जातीय व्यवस्था, जिस ब्राह्मणवादी सोच और जिस मानवीय गरिमा की बात वो करते थे, उसी मानवीय गरिमा को वो अपने आंदोलन के माध्यम से बार-बार पद दलित करते थे। अपनी राजनीतिक सोच में जिस प्रकार से वो पाकिस्तान की मांग के समर्थक थे और हिन्दू धर्म की जगह इस्लाम व अन्य धर्मों का सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करते थे, वह उनके तर्कवादी व विवेकवादी सोच पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। वर्तमान पाकिस्तान इस्लामिक धर्मान्धता का केन्द्र बना हुआ है। इस्लामिक धार्मिक भावना का आहत करना राष्ट्र व ईश्वर के प्रति अपराध माना गया है और इसके लिए एक ही सजा की व्यवस्था वहाँ की गई है, वह है मृत्यु दंड। यदि अपनी सोच और तर्क के आधार पर ही पेरियार चलते और जिस प्रकार वह 1950-60 के दशक में व 70 के प्रारंभ में स्वयं और उनके समर्थक जिस प्रकार हिन्दू धर्म का सार्वजनिक अपमान (व हिन्दू देवी-देवताओं विशेषकर राम व कृष्ण भारतीय आदर्श के प्रतीक को बार-बार अपमानित और अभद्र टिप्पणी किया), शायद पाकिस्तान में इस्लाम के प्रति इस प्रकार की धार्मिक असहिष्णुता दिखाई देती तो शायद वह अपनी सोच को आगे  ना ला पाते।
भारतीय राज्य व सनातन संस्कृति के सहिष्णु विचारों के कारण ही कई बार राजनीतिक चिंतक भारतीय राज्य को एक लचीला राज्य (साफ्ट स्टेट) कहते हैं। उनका मानना है कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ आप उसकी भाषा, नीति, संविधान, राष्ट्रीय प्रतीक, व राष्ट्रीय भावना को चाहे जितना भी पददलित करें यदि समाज का कोई वर्ग उसे सम्मान की दृष्टि से देखता है तो राष्ट्र भले ही उसके विचारों से सहमत न हो, परन्तु उसे सम्मान प्रदान करता है। रामास्वामी भारतीय युगपुरुष के वैसे ही श्रेणी में आते हैं, जिन्होंने राष्ट्रवादी आंदोलन के समय और स्वतंत्रता उपरान्त ऐसा कोई अवसर नहीं छोड़ा जिसमें राष्ट्रीय भावना, राष्ट्रीय प्रतीक व राष्ट्रीय गरिमा का अपमान न किया हो। यदि उनका विरोध ब्राह्मण व्यवस्था या ब्राह्मणवादी सोच तक ही सीमित होती और मानववाद, तर्कवाद व विवेकवाद को प्रोत्साहित करने पर होता तो वह शायद भारतीय समाज के सभी वर्ग के लिए युगद्रष्टा हो सकते थे।

  • Satish Anna
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