Kurf and Shikra 

कुरान में कुफ्र और शिर्क यह दो ऐसे महापाप बताये गए है ,जिनकी सज़ा मौत है। इन पापों को करने वाले मरने के बाद भी हमेशा नर्क में ही रहेंगे। (कुरान सूरे मायदा आयत १०और ८७)

यह दो महापाप इस प्रकार हैं-

१-कुफ्र-अल्लाह और मुहम्मद से इनकार करना,और शरीयत को न मानना कुफ्र कहलाता है। और कुफ्र करने वालों को काफिर कहा जाता है।

२-शिर्क-अल्लाह के अलावा किसी देवी देवता ,या व्यक्ति अथवा किसी वस्तु की उपासना करना,वन्दना करना ,और प्रणाम करना ,यह सब शिर्क कहलाता है। शिर्क करने वालों को मुशरिक कहा जाता है ।
अल्लाह अगर चाहे तो काफिर को माफ़ भी कर सकता है ,लेकिन मुशरिक को कभी भी माफ़ नहीं करेगा। उक्त परिभाषाओं के मुताबिक देशभक्ति शिर्क की श्रेणी में आती है। क्योंकि भारतीय हिन्दू अपने देश को भारत माता कहकर उसकी वन्दना करते है। भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित करते है,और उसे एक देवी का रूप मान कर आदर करते हैं। इसके बारे में इकबाल ने कहा था –

नौ जादा खुदाओं में ,सबसे बड़ा वतन है ,

जो पैरहन है उसका ,मज़हब का वो कफ़न है।

अर्थात नए नए पैदा हुए देवताओं में वतन भी एक बड़ा देवता है,और इसको पहिनाने के लिए ,मज़हब के कफ़न की ज़रूरत है। तात्पर्य यह है की इस देश रूपी देवी के ऊपर कफ़न डालने की ज़रूरत है। यही कारण है की मुसलमान न तो कभी वन्देमातरम कहते हैं और न कभी भारत माता की जय बोलते हैं। यहां तक की वे योग और सूर्य नमस्कार का भी विरोध करते हैं।
उनके अनुसार ऐसा करना शिर्क है। फ़िर भी यहाँ के मुसलमान ख़ुद को देशभक्त साबित करने के लिए अक्सर कहते रहते हैं की उनके पुरखों ने देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से जंग की थी। इसलिए दूसरों की तरह हमारा भी देश पर अधिकार है। लेकिन यह बात सरासर झूठ और भ्रामक है । मुसलामानों ने अंग्रेजों से जंग जरूर की थी , लेकिन देश की आजादी के लिए नहीं। वे अंग्रेजों के दुश्मन इसलिए हो गए थे की , अंग्रेजों ने तुर्की के खलीफा अब्दुल हमीद को उसकी गद्दी से उतार दिया था। जबकि दुनिया के सारे मुस्लिम बादशाह और नवाब खलीफा को अपना धार्मिक और राजनीतिक नेता मानते थे , और ख़ुद को उसका नुमायन्दा मानकर , मस्जिदों में उसके नाम का खुतबा पढाते थे। खलीफा को हटाने के कारण मुसलमान अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए ,और उन्होंने खिलाफत मूवमेंट नामका एक संगठन बना लिया था। वीर सावरकर ने इसे खुराफात मूवमेंट कही नाम दिया था।
गांधी ने सोचा की यदि स्वतंत्रता आन्दोलन में इस संगठन को भी शामिल कर लिया जाए तो आन्दोलन को और बल मिलेगा। बस यही गांधी की भूल थी। उस मूर्ख को यह पता नहीं था , की यदि मुसलामानों की मदद से आजादी मिल भी जायेगी, तो मुसलमान अपना मेहनताना जरूर मागेंगे और बाद में ऐसा ही हुआ। मुसलमानों ने पाकिस्तान के रूप में अपना हिस्सा ले लिया।
दिसम्बर १९३० में इलाहबाद में आयोजित मुस्लिम लीग के अधिवेशन में इकबाल ने कहा था –

हो जाय अगर शाहे खुरासान का इशारा ,

सिजदा न करूं हिंद की नापाक ज़मीं पर।

अर्थात यदि हमें तुर्की के खलीफा का इशारा मिल जाए तो हम इस हिन्दुस्तान की नापाक ज़मीन पर नमाज़ तक न पढेंगे।

हमें इनके झूठे भाईचारे ,गंगा जमुनी तहजीब जैसी मक्कारी भरी बातों में नही आना चाहिए। यह लोग न तो कभी देश के वफादार थे और न भविष्य में होंगे।

  • Satish Mylavarapu
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